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किशनगंज में ई-शिक्षाकोश पोर्टल से फर्जी हाजिरी का खुलासा

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किशनगंज में ई-शिक्षाकोश पोर्टल के जरिए फर्जी उपस्थिति दर्ज करने का मामला सामने आया है। सात शिक्षक स्कूल से बाहर रहकर ऑनलाइन हाजिरी लगाते पकड़े गए हैं।

किशनगंज/आलम की खबर: बिहार के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए लागू की गई ऑनलाइन उपस्थिति प्रणाली अब सवालों के घेरे में आ गई है। किशनगंज जिले में ई-शिक्षाकोश पोर्टल के जरिए फर्जी हाजिरी लगाने का बड़ा मामला सामने आया है। जांच में खुलासा हुआ है कि कई शिक्षक स्कूल पहुंचे बिना ही ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कर रहे थे। जिला शिक्षा विभाग की समीक्षा के बाद यह मामला सामने आते ही शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है।

जिला शिक्षा पदाधिकारी नासिर हुसैन द्वारा की गई समीक्षा में पाया गया कि कुछ शिक्षक किशनगंज जिले से बाहर रहकर भी “मार्क ऑन ड्यूटी” विकल्प का इस्तेमाल कर नियमित उपस्थिति दर्ज कर रहे थे। जबकि वास्तविकता यह थी कि वे संबंधित स्कूलों में मौजूद ही नहीं थे। विभाग ने इस पूरे मामले को गंभीर अनुशासनहीनता और सरकारी व्यवस्था के दुरुपयोग की श्रेणी में रखा है।

जानकारी के अनुसार जिला शिक्षा कार्यालय की ओर से जारी पत्रांक 760 के तहत सात शिक्षकों की गतिविधियों को संदिग्ध पाया गया। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि पोर्टल पर दर्ज उपस्थिति और शिक्षकों की वास्तविक लोकेशन में भारी अंतर था। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर लंबे समय से यह खेल चल रहा था।

जिन शिक्षकों पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है उनमें प्रोजेक्ट बालिका उच्च विद्यालय पोठिया के सहादत हुसैन अंसारी, मध्य विद्यालय भोगडाबर ठाकुरगंज के मो. नाहिद रजा, उत्क्रमित मध्य विद्यालय डांगीबस्ती की सोनम राय, नवप्राथमिक विद्यालय गिधिन गोला पासवान टोला के प्रवीण कुमार, उत्क्रमित मध्य विद्यालय दुराघाटी के प्रधानाध्यापक महबूब आलम, उच्च माध्यमिक विद्यालय बरचौंदी के लोकेश कुमार और मध्य विद्यालय बनगामा बहादुरगंज के असगर बेलाल शामिल हैं।

जिला शिक्षा पदाधिकारी नासिर हुसैन ने कहा कि ई-शिक्षाकोश पोर्टल को शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इसका मकसद शिक्षकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना और स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारना था। लेकिन कुछ लोग तकनीकी व्यवस्था का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, जो बेहद गंभीर मामला है।

उन्होंने बताया कि सभी संबंधित शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दो दिनों के भीतर लिखित स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया गया है। यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो संबंधित शिक्षकों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की जाएगी। इसमें वेतन रोकना, निलंबन और सेवा समाप्ति जैसी कठोर कार्रवाई भी शामिल हो सकती है।

इस पूरे मामले ने सरकारी स्कूलों की निगरानी व्यवस्था और ऑनलाइन सिस्टम की विश्वसनीयता पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मोबाइल आधारित उपस्थिति प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा सकती। यदि उसमें मजबूत लोकेशन ट्रैकिंग, फेस रिकग्निशन और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसी सुविधाएं नहीं होंगी तो इस तरह की गड़बड़ियों की संभावना बनी रहेगी।

जानकारों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों की अनुपस्थिति एक बड़ी समस्या रही है। कई बार अभिभावकों ने शिकायत की है कि शिक्षक समय पर स्कूल नहीं पहुंचते, जिससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। अब ऑनलाइन उपस्थिति प्रणाली में भी फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद अभिभावकों की चिंता और बढ़ गई है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे गरीब और ग्रामीण परिवारों से आते हैं। ऐसे में यदि शिक्षक स्कूल नहीं जाएंगे तो इसका सीधा असर बच्चों के भविष्य पर पड़ेगा। ग्रामीण अभिभावकों ने दोषी शिक्षकों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है ताकि शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो सके।

घटना के बाद जिला शिक्षा विभाग ने अन्य सरकारी स्कूलों की उपस्थिति रिपोर्ट की भी जांच शुरू कर दी है। कई स्कूलों के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं और भी इसी तरह की गड़बड़ी तो नहीं हो रही। विभागीय सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में और भी कई मामलों का खुलासा हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में तकनीक का इस्तेमाल जरूरी है, लेकिन केवल तकनीक के भरोसे पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए नियमित फिजिकल निरीक्षण, लोकेशन आधारित ट्रैकिंग और जवाबदेही तय करना भी जरूरी है। यदि निगरानी व्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो सरकारी योजनाओं का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

बिहार सरकार पिछले कुछ वर्षों से शिक्षा क्षेत्र में डिजिटल सुधारों पर जोर दे रही है। ई-शिक्षाकोश पोर्टल भी इसी दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम माना गया था। इस पोर्टल के जरिए शिक्षकों की उपस्थिति, छात्रों की जानकारी और स्कूल गतिविधियों की निगरानी की जाती है। लेकिन किशनगंज का यह मामला बताता है कि तकनीकी व्यवस्था में अब भी कई खामियां मौजूद हैं।

राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। शिक्षा सुधार की बात करने वाली सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करे। कई सामाजिक संगठनों ने भी पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई की मांग की है।

फिलहाल शिक्षा विभाग पूरे मामले की विस्तृत जांच में जुटा हुआ है। अधिकारियों का कहना है कि दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। विभाग यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भविष्य में कोई भी शिक्षक सरकारी पोर्टल और शिक्षा व्यवस्था का दुरुपयोग करने की हिम्मत न कर सके।

इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल ऑनलाइन व्यवस्था से शिक्षा व्यवस्था सुधर सकती है या फिर इसके साथ मजबूत निगरानी और जवाबदेही तंत्र भी जरूरी है। आने वाले दिनों में विभागीय जांच और कार्रवाई पर सभी की नजर बनी रहेगी।

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